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जीवन की छोटी-छोटी समस्याएं हमें कुछ भी करने पर मजबूर कर देती हैं। आज हम एक ऐसी महिला की बात करेंगे, जिसने अपने बच्चों का पेट पालने के लिए अपने हाथों में रिंच और हथौड़ा पकर लिया। दरअसल वह महिला उत्तर प्रदेश के लखनऊ में पंचर बनाने का काम करती हैं। उनकी दुकान छठी मील में है। तरन्नुम साईकिल से लेकर ट्रक तक के पंचर बना लेती हैं।

बहुत ही कम उम्र में तरन्नुम ने पंचर बनाने का काम शुरू कर दिया था। तरन्नुम बताती हैं कि उन्हें याद भी नहीं है कि आख़िरी बार उन्होंने कब हाथों पर मेंहदी लगाई थी? पंचर की दुकान में ज्यादा आमदनी नहीं हो पाता थी। जिसके वजह से वह अपने बच्चों को अच्छे स्कूल में पढ़ा नहीं पाई। तरन्नुम के लिए पंचर की दुकान चलाकर पांच लोगों के खाने का इंतजाम करना ही बहुत मुश्किल होता था।

आमतौर पर पंचर बनाने का काम पुरुषों का माना जाता है परंतु तरन्नुम ने इस काम का चुनाव इसलिए किया क्योंकि उन्हें दूसरों के घरों में झाड़ू-पोछा का काम करना पसंद नहीं था। उनका ऐसा मनना है कि गरीब हैं परंतु मालिक द्वारा रोज का अपमान नहीं सह सकते। ऐसे में घर चलाने के लिए उन्होंने यह हुनर सीख लिया। आसपास किसी से भी तरन्नुम पंचर वाली के बाड़े में पूछने से कोई भी उनकी दुकान कर पता बता देता है।

23 साल पहले एक रिटायर्ड पुलिस वाला तरन्नुम के पास अपनी गाड़ी का पंचर ठीक कराने आया था। उसने तरन्नुम से कहा था कि बेटी तुम बहुत आगे जाओगी। तुम्हें कभी किसी के आगे हाथ नहीं फैलाने पड़ेंगे। उनके द्वारा इस वाक्य को तरन्नुम आजतक भुल नहीं पायीं हैं। ‘देखो कितना अच्छा काम कर रही है।’ ‘घर भी संभालती और दुकान भी!’… ‘सीखो इनसे।’ ऐसे वाक्य तरन्नुम अक्सर सुना करती है। 

उत्तर प्रदेश के सीतापुर जिला मुख्यालय से 30 किलोमीटर दूर गंगापुरवा गांव की रहने वाली हैं। तरन्नुम के दो बेटे और एक बेटी है। उनके लिए लखनऊ का माहौल बिल्कुल अलग था। उन्हें यहां की ज्यादा जानकारी भी नहीं थी। आज तरन्नुम लखनऊ के जानकीपुरम क्षेत्र में अपनी एक पहचान बना चुकी है। तरन्नुम बहुत ही अच्छा पेंटिंग भी करती हैं। तरन्नुम के लिए यह सफर बिल्कुल भी आसान नहीं था। उन्हें इस मुकाम तक पहुंचने के लिए बहुत से मुश्किलों का सामना करना पड़ा। तरन्नुम बताती हैं कि शादी के केवल एक साल बाद ही उन्हें यह एहसास हो गया कि उन्हें कोई काम करना पड़ेगा।

तरन्नुम शुरूआत में एक दुकान में पंचर बनाने काम करती थी। उसके बाद उन्होंने अपनी दुकान खोल ली। उसी दुकान से उन्होंने पंचर बनाने का काम सिखा था।तरन्नुम का जन्म समान्य परिवार में हुआ और महज 15 साल की उम्र में उनकी शादी करा दी गई। शादी के बाद इनके पति ज्यादातर बीमार ही रहते थे। जिससे वह घर का खर्च तक नहीं चला पाते थे, तब ही तरन्नुम को घर खर्च के लिए काम करना पड़ा था।

सोनू मूल रूप से बिहार के समस्तीपुर जिला के रहने वाले है पिछले 4 साल से डिजिटल पत्रकारिता...